जो ज़ुबा माँ नही बोल पाई, उसकी आह से आहत है हर कोई

-अज्ञात बीमारी का शिकार बना बाड़मेर का मासूम बच्चा

-4 साल के मासूम के हाथों पैरों की अंगुलिया हुई गायब

-ईलाज में लाखों रुपये लगाने के बाद कर्जदार हुआ परिवार

बाड़मेर: “अभी तुतलाती जुबा से माँ कहना भी नही सीखा है लेकिन चार बरस की जिंदगी में एक रात भी शकुन से नही गुजरी। अनजान और अनसुनी बीमारी के क्रूर पंजो से बाहर निकलने की छटपटाहट में शरीर के हर हिस्से से खून रिसता है।

हालात इतने नासाज है दोनो हाथ पैर की अंगुलियों भी अब गायब हो गई है।”यह किसी कहानी की लाइनें नही बल्कि यह लाइनें ही 4 साल के ओमा की जिंदगी के दर्द के सैलाब को बयां करती कहानी है। दिनांक 9 नवम्बर 2014 को राजकीय चिकित्सालय बाड़मेर में बानो की ढाणी,जालीपा आगोर ने बेटे को जन्म दिया। पिता बालाराम के लिए वह दिन यादगार बना ही था कि बच्चे के जन्म के तीसरे ही दिन उसे चमड़ी में संक्रमण के चलते जोधपुर रैफर कर दिया गया। 11 दिसम्बर 2014 से रैफर और अस्पताल बदलने का दुःखद दौर अभी तक जारी है। सरकारी अस्पतालों, निजी अस्पतालों से लेकर एम्स और अहमदाबाद के सिविल अस्पताल के डॉक्टरों की दवाइयां ओमा ले चुका है लेकिन उसकी बीमारी पर उसका कोई असर नही होता। अब इसके शहरी का हर हिस्सा घावों से भर चुका है वही हाथ और पैरों की अंगुलिया गायब हो चुकी है। दीमक जैसे लकड़ी को खाता है वैसे ही यह अनजान बीमारी ओमा को खा रही है।

एक माँ के अपने मासूम की नंन्ही अंगुलियों को थाम कर चलना और उसे गोद मे लेना सबसे बड़ा सुख होता है लेकिन धन्नी देवी वह अभागन माँ है जिसके लिए बेटे के आंखों के सामने होने के बावजूद यह सम्भव नही है। ओमा के दादा पुरखाराम बताते है कि जमीन आवप्ति के बाद मुआवजे में मिले 7-8 लाख इलाज में खर्च हो चुके है और अब कर्जदार हो चुका हूं।पुरखाराम के मुताबित पोते को तिल तिल कर मौत के मुंह मे जाते हुए देख रहा हु लेकिन दिहाड़ी मजदूर होने के नाते अब हाथ मे कुछ नही है।पुरखाराम अश्को से भरी आंखों और रुँधे गले से आहत को राहत देने करने वाली सरकार, जनप्रतिनिधियों और स्वयंसेवी संस्थाओं से मदद की गुहार करते नजर आते है।

4 साल की उम्र में इलाज के 40 दर

जन्म लेने के तीसरे दिन से ही ओमा के घरवाले उंसके इलाज के लिए दर दर की ठोकरे खा रहे है।ओमा के घरवालो ने राजकीय चिकित्सालय बाड़मेर 3 दिन बाद उम्मेद अस्पताल जोधपुर , तालेसरा सांचोर,अक्षरा अस्पताल डिसा,डॉक्टर महेंद्र चौधरी बाड़मेर ,डॉक्टर मनीष सेठिया जोधपुर, डॉक्टर ज्ञानेश्वर कल्ला जोधपुर,एम्स जोधपुर,सिविल हॉस्पिटल अहमदाबाद,डॉक्टर प्रदीश आर प्रदीप मेहसाणा(अमेरिका रिटर्न) के पास इलाज के लिए लेकर गए लेकिन कही से भी कोई अच्छी खबर नही आई। आज ओमा की ज़ुबान भी बीमारी की भेंट चढ़ चुकी है। अब जब माली हालात नासाज है तो घरवाले उसे घर लेकर बैठे है।

खेत मे खाली दवाइयों की बोतलों का अंबार

ओमा का ईलाज जिन जिन जगहों पर हुआ सभी ने उसे टैबलेट और शिरप पीने के लिए दी। आज पुरखाराम की ढाणी के आगे खेत मे जगह जगह दवाइयों के अंबार नजर आते है। ओमा के पिता बालाराम के मुताबित यह तो महज 6 महीने की दवाइयों की खाली बोतल है अगर 4 साल की दवाइयों का तो अंबार लग जाता। अब तब ओमा ने अपने हलक में सैकड़ों दवाइया गटकी है । उंसके हालात को ऐसे भी जाना जा सकता है कि इन दवाइयों में ना जाने कितनी दवाइया कड़वी होने के बावजूद उसने ली है क्योंकि वह अपनी जुबा से दवाई कड़वी है यह भी तो नही कह सकता।

Web Title : Barmer's innocent child, victim of unknown disease