पर्यावरण संरक्षण पर सम्मेलन का आयोजन, पर्यावरण का प्रखर प्रहरी है जोधपुर का बिश्नोई समाज

जोधपुर: दुनिया में पर्यावरण को बचाने के लिए चिपको आंदोलन सबसे बड़ा आंदोलन माना जाता है, जो सत्तर के दशक में उत्तराखंड में देखने को मिला था। राजस्थान में यही आंदोलन 1730 में देखने को मिला था, जब जोधपुर से करीब 25 किमी दूर खेजड़ली गांव के 363 लोगों ने अपने गांव के पेड़ों को कटने से बचाने के लिए अपनी जान दे दी थी। पशु और पर्यावरण प्रेमी बिश्नोई समाज जैसी मानवता शायद दुनिया के किसी भी कोने में देखने को नहीं मिलेगी।

इसी को लेकर आज भी पर्यावरण के असंतुलन और उसमें हो रहे बदलाव को लेकर यही समुदाय काफी चिंतित है, दरअसल राजस्थान बिश्नोई युवा अधिवक्ता परिषद जोधपुर के तत्वावधान में आज जोधपुर के मेडिकल कॉलेज सभागार में पर्यावरण सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण व प्रकृति के प्रति एक सम्मान और बढ़ते शहरी करण व आज पर्यावरण का मुद्दा पूरे विश्व में एक चिंता का विषय बन गया है, इन तमाम मुद्दों को लेकर यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है, इस मौके पर आयोजित सम्मेलन में राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जी के व्यास विश्नोई समाज के कुलदीप बिश्नोई सहित समाज के गणमान्य लोग और राजस्थान हाई कोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रणजीत जोशी, राजस्थान हाई कोर्ट लॉयर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुनील जोशी सहित अधिवक्ता मौजूद रहे।

इस मौके पर आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने आज के परिपेक्ष में बढ़ते प्रदूषण को लेकर चिंता जताई । साथ ही लोगों ने आह्वान किया कि जिस तरह से वर्तमान में प्रदूषण विश्वव्यापी एक भयंकर समस्या के रूप में सामने आया है। इसके दुष्परिणाम आज हम सभी के सामने हैं। ऐसे में पर्यावरण को दूषित होने से बचाने का एक मात्र उपाय है कि ज्यादा से ज्यादा पेड़ पौधे लगाएं और पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त बनाने में हर व्यक्ति को जागरूकता के साथ आगे आकर काम करना होगा। वक्ताओं ने कहा कि तभी पर्यावरण को प्रदूषण से बचाया जा सकता है। वक्ताओं ने आमजन से पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए आमजन को जागरूक होने का आह्वान किया।

आपको बता दे कि पश्चिमी राजस्थान से सम्बन्ध रखने वाले विश्नोई समुदाय के लोगों का रोज़मर्रा के जीवनयापन करने के तरीकों में ही प्रकृति के प्रति एक सम्मान और उसके संरक्षण के विचारों का गहरा प्रभाव है। इस समाज द्वारा पर्यावरण के लिये किये गये आंदोलनों का एक पूरा समृद्ध इतिहास रहा है। 19वीं शताब्दी में पर्यावरण के संरक्षण के लिये चलाया गया चिपको आंदोलन हो या 17 वीं शताब्दी का खेजड़ली आन्दोलन हो जहां बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने खेजड़ी के वृक्षों को काटे जाने के विरोध में अपने प्राणों की आहूति दी, इन आन्दोलनों में इस समाज ने हमेशा आगे बढ़ कर अपना योगदान दिया है।

खेजड़ली आन्दोलन की बात करें तो अमृता देवी के नेतृत्व में इस आन्दोलन की शुरुआत हुई जब यहां के राजा ने महल के निर्माण के लिये पेड़ों को काटने का आदेश दिया और जब वो लोग गांवों में पहुंचे तो वहां के ग्रामीणों ने इसका पुरज़ोर विरोध किया। इसके कारण कई लोगों को इसमें में अपनी जान गंवानी पड़ी। यह घटना आज भी हमारे देश में हो रहे पर्यावरण के क्षेत्र में हो रहे आन्दोलनों के लिये एक आदर्श है।

वहीं इस समुदाय में पर्यावरण को लेकर यह चेतना तथा उसके संरक्षण की प्रेरणा कहां से आती हैं तो हमें इसे समझने के लिये इस सम्प्रदाय के उद्गम के बारे में जानना होगा। गुरु जभेश्वर जो कि जम्भो महाराज के नाम से जाने जाते हैं, को बिश्नोई पंथ का प्रवर्तक माना जाता हैं। बिश्नोई शब्द दो शब्दों बीस और नौ से मिलकर बना है और इसका मतलब है कि इस समुदाय के पंथ-प्रवर्तक द्वारा जीवन जीने के उन्तीस नियम सुझाये गये हैं। इन उनतीस नियमों में आठ नियम प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन से जुड़े हुए हैं। जिसमें मासांहार ना करना, बैल को बधिया ना करना, पेड़ों को नहीं काटने जैसे नियम शामिल हैं। इस समाज द्वारा इन नियमों का आज भी ईमानदारी से पालन किया जाता है। जंगली जानवरों में इस समुदाय के प्रति एक ख़ास लगाव देखा जाता है।

 

Web Title : Conducting Conference on Environment Protection