चुनाव से आपसी हिसाब निपटा रहे कांग्रेस नेता

नई दिल्ली। एग्जिट पोल ने कांग्रेस की दो मोर्चों पर फिक्र बढ़ा दी है। पहली यह कि अगर केंद्र में उसकी या उसके सहयोग वाली सरकार नहीं बन पाई तो संघर्ष और बढ़ जाएगा और सत्ता में वापसी के लिए उसे किसी बड़े चमत्कार की जरूरत होगी। दूसरी चुनौती राज्यों में पार्टी के भीतर जारी गुटबाजी को रोकने की होगी, जिसको न रोक पाने पर उसकी राज्य सरकारों की स्थिरता को खतरा हो सकता है।

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू खुलकर आमने-सामने आ गए हैं। कैप्टन ने पब्लिक प्लैटफॉर्म पर कह दिया है कि सिद्धू उन्हें हटाकर मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। ऐसा ही मोर्चा मध्य प्रदेश और राजस्थान में खुलने का अंदेशा है। इन दोनों राज्यों में लोकसभा चुनाव के दौरान वहां के मुख्यमंत्रियों और मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहने वालों के बीच विधानसभा चुनाव जैसा एका नहीं देखा गया। दोनों जगह यह चर्चा खुलकर रही कि सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक अपने हाथ खींचे हुए हैं। उनका मानना था कि जिन्हें मुख्यमंत्री पद के योग्य समझा गया, पार्टी को लोकसभा चुनाव जिताने की जिम्मेदारी भी उन पर ही आती है। कमलनाथ को लेकर सियासी गलियारों में यह भी कहा गया कि सिंधिया की राज्य में दखलंदाजी को खत्म कराने के लिए ही उन्हें वेस्टर्न यूपी का प्रभारी बनवाया गया। दिग्विजय सिंह को बीजेपी का गढ़ समझी जाने वाली भोपाल सीट से चुनाव लड़वाने का आइडिया भी कमलनाथ का ही था। यानी सब अपनी-अपनी जगह भरे हुए बैठे हैं। छत्तीसगढ़ की भी कुछ ऐसी ही स्थिति कही जा रही है। 23 मई को अधिकृत रूप से नतीजे आने का इंतजार है। इन सबके मद्देनजर कांग्रेस आलाकमान की चिंता बढ़नी स्वाभाविक है।

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