गुर्जर आंदोलन : 13 साल में 6 बार गुर्जर Vs सरकार, 73 मौतें…आज फिर उसी पटरी पर

आरक्षण की मांग को लेकर फिर आंदोलन की राह पर उतरा गुर्जर समाज पूरी रात रेलवे ट्रैक पर डटे रहे. अल सुबह पाला पड़ने के साथ सर्दी के तीखे तेवर के बीच भी आंदोलनकारी रेलवे ट्रैक पर जमे रहे. रेलवे ट्रैक पर दूर-दूर तक तंबू गाड़ दिए गए हैं. इसके साथ ही सर्दी से बचने के लिए जगह-जगह अलाव भी जलाए जा रहे हैं. ट्रैक पर मौजूद गुर्जर समुदाय के लोगों के लिए चाय व नाश्ते की व्यवस्था भी ट्रैक के पास ही की जा रही है. आरक्षण को लेकर सड़क पर उतरे गुर्जर समाज का कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में यह सातवां आंदोलन है.

जयपुर। गुर्जर…, आरक्षण… और आंदोलन। ये तीन शब्द राजस्थान के ​लिए कोई नए नहीं हैं. सुने और पढ़े तो दशकों से जा रहे हैं, मगर पिछले 13 साल के दौरान तीनों ही शब्दों का मतलब गुर्जर Vs सरकार, यातायात ठप्प और जनजीवन पटरी से उतर जाना हो गया है. 5 फीसदी आरक्षण की मांग को लेकर पिछले 13 साल में एक पुलिसकर्मी समेत73 मौतें होने के बाद भी मांग और आंदोलन का रूख आज भी पटरियों पर ही है.

दरअसल अब एक बार फिर गुर्जरों को आरक्षण की मांग को लेकर प्रदेश भर में आंदोलन की चिंगारी भड़क चुकी है. आरक्षण को लेकर सड़क पर उतरे गुर्जर समाज का कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के नेतृत्व में यह सातवां आंदोलन है. कोटा में भी हाड़ौती गुर्जर समाज ने एक मीटिंग आयोजित की. जिसमें बंजारा, गाड़िया लुहार, रायका सहित पांच जाति के लोग मौजूद रहे. बैठक के बाद सभी समाज के लोग पैदल मार्च करते हुए संभागीय कार्यालय पहुंचे और धरने पर बैठ गए. करीब एक घंटे तक धरना देने के बाद समाज के लोगों ने प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के नाम का ज्ञापन प्रशासन को सौंपा. प्रदर्शन के दौरान उन्होंने सरकार को उग्र आंदोलन की चेतावनी दी है.

गुर्जर आरक्षण आंदोलन शुरू होने के साथ ही जहां सियासी गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है, वहीं, यात्रियों से लेकर आमजन मुसीबत में फंस गए हैं. हालांकि, कांग्रेस सरकार की तरफ से आंदोलन को खत्म कराने को लेकर बातचीत का ट्रैक अपनाते हुए कोशिशें तेज कर दी गई हैं.

बता दे कि आंदोलन राजस्थान के सवाई माधोपुर के मलारना रेलवे स्टेशन के पास मकसूदनपुरा गांव से शुक्रवार शाम से शुरू किया गया है. वहीं गुर्जर समाज के लोगों ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार ने गुर्जरों का आरक्षण की मांग को नहीं माना तो समाज के लोग सड़कों पर आ जाएंगे. समाज किसी भी कीमत पर चुप नहीं बैठने वाला है. यह तो ट्रेलर है यदि कल तक रिजल्ट नहीं आया तो पूरी फिल्म दिखा देंगे. इसके लिए बलिदान भी देना पड़े तो समाज के लोग तैयार हैं. कोटा में भी उग्र आंदोलन होगा.(Gurjar Aandolan 2008) : तीसरा बार में बढ़ा मौतों का आकड़ा

शनिवार को गुर्जर आंदोलन 2019 का (Gurjar Aandolan 2019) दूसरा दिन है। गुर्जर रेल पटरियों पर डटे हुए हैं। राजस्थान में ट्रेनों का संचालन गड़बड़ाने के साथ-साथ बसों का परिवहन भी प्रभावित होने लगा है। दिल्ली-मुम्बई ट्रैक तो आंदोलन शुरू होने के कुछ समय बाद से ही जाम है। पटरियों पर तंबू गाड़ कर बैठे गुर्जरों ने शुक्रवार की रात भी ट्रैक पर ही गुजारी थी। आईए डालते हैं राजस्थान के गुर्जर आंदोलन के इतिहास पर एक नजर। (Gurjar Aandolan 2006) : गुर्जर आंदोलन की शुरुआत वर्ष 2006 सेगुर्जर आंदोलन की शुरुआत वर्ष 2006 में हुई 

देश में आरक्षण की चिंगारी तो आजादी के बाद से ही सुलग रही है, मगर राजस्थान में गुर्जर आंदोलन की चिंगारी सबसे पहले वर्ष 2006 में भड़की। तब से लेकर अब तक रह-रहकर छह बार बड़े आंदोलन हो चुके हैं। इस दौरान भाजपा और कांग्रेस दोनों की सरकार रही, मगर किसी सरकार से गुर्जर आरक्षण आंदोलन की समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकला। वर्ष 2006 में एसटी में शामिल करने की मांग को लेकर पहली बार गुर्जर राजस्थान के हिंडौन में सड़कों व रेल पटरियों पर उतरे थे। गुर्जर आंदोलन 2006 के बाद तत्कालीन भाजपा सरकार महज एक कमेटी बना सकी, जिसका भी कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला।

दूसरी बार में 28 लोग मारे गए थे

वर्ष 2006 में हिंडौन में रेल पटरियां उखाड़ने वाले गुर्जर कमेटी बनने के बाद कुछ समय के लिए शांत जरूर हुए थे, मगर चुप नहीं बैठे और 21 मई 2007 फिर आंदोलन का ऐलान कर दिया। गुर्जर आंदोलन 2007 के लिए पीपलखेड़ा पाटोली को चुना गया। यहां से होकर गुजरने वाले राजमार्ग को जाम कर दिया। इस आंदोलन में 28 लोग मारे गए थे। फिर चौपड़ा कमेटी बनी, जिसने अपनी रिपोर्ट में गुर्जरों को एसटी आरक्षण के दर्ज के लायक ही नहीं माना था।

तीसरा बार में बढ़ा मौतों का आकड़ा

पीपलखेड़ा पाटोली में गुर्जर आंदोलन किए जाने के सालभर बाद ही गुर्जरों ने फिर ताल ठोकी। सरकार से आमने-सामने की लड़ाई का ऐलान कर 23 मार्च 2008 को भरतपुर के बयाना में पीलु का पुरा ट्रैक पर ट्रेनें रोकी। सात आंदोलनकारियों को पुलिस फायरिंग में जान गंवानी पड़ी। सात मौतों के बाद गुर्जरों ने दौसा जिले के सिंंकदरा चौराहे पर हाईवे को जाम कर दिया। नतीजा यहां भी 23 लोग मारे गए और गुर्जर आंदोलन 2008 तक मौतों का आंकड़ा 28 से बढ़कर 58 हो गया, जो अब तक 72 तक पहुंच चुका है।

वर्ष 2008 के बाद दो बार और गुर्जर आंदोलन हुआ। 24 दिसम्बर 2010 और 21 मई 2015 में है। गुर्जर आंदोलन 2010 (Gurjar Aandolan 2010) और गुर्जर आंदोलन 2015 (Gurjar Aandolan 2015) हुआ। दोनों ही बार में मुख्य केन्द्र राजस्थान के भरतपुर जिले की बयाना तहसील का गांव पीलु का पुरा रहा। यहां पर आरक्षण की मांग को लेकर गुर्जरों ने रेल रोकी और महापड़ाव डाला। तब जाकर पांच प्रतिशत आरक्षण का समझौता हुआ। मिला एक प्रतिशत, क्योंकि इससे ज्यादा देने पर कुल आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा हो रहा था। वर्ष 2018 तक मसला नहीं सुलझा और अब 8 फरवरी से गुर्जरों ने सवाई माधोपुर के मलारना रेलवे स्टेशन के पास गांव मकसूदनपुरा से गुर्जर आंदोलन शुरू कर रखा है।

 

Web Title : Gujjar agitation: Gujjar Vs government 6 times in 13 years