प्रवास में भी गूंजने लगे है फाग,प्रवासी मारवाड़ी का दिल मांगे चंग

एक महिना जिसमें खुलकर गाये जाए है गीत.... आवाज के साथ साज की बात आये तो चंग की बात ही कुछ निराली है कि अब प्रवास में मारवाड़ी का मन चंग की मांग करने लगा है ...........

राजस्थान खोज खबर. होली के मौके चंग की थाप लगते ही फाग के गीतों की धमचक बढ़ जाती है . लेकिन अब मारवाड़ से बाहर बसे प्रवासियों को अपने रंगों की याद सताने लगी है . इसके लिए प्रवासी अपने अपने यहाँ बनी चंग की मांग कर रहे है.
बढ़ गई चंग की मांग: ये ही वजह है कि अब जोधपुर के गांवों में बनने वाली चंग की मांग में वृद्धि हुई है.आपको बता दें कि होली के त्यौहार पर चंग के संग फाग गाने का रिवाज है.
                                           जानवर की खाल से बनती हैं चंगImage result for चंग
चंग बनाने के लिए रोहिड़ा व आम की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। लकड़ी का गोल घेरा बनाने के बाद उस पर जानवर की खाल चढ़ाई जाती है। साथ ही इसके आकर्षक व सुंदर बनाने के लिए चंग पर रंगीन चित्र बनाए जाते है। रंगीन चित्र बनाने का कार्य महिलाओं द्वारा किया जाता है।  चंग 24, 25, 26, 30 व 35 इंच की साइज की बनाई जाती हैं। चंग 1 से 3 हजार रुपए तक में बिकती है।
                                        प्रवासियों का दिल मांगे चंग 
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                        मारवाड़ के बने चंग की बैंगलोर, मद्रास, मुंबई, पूना व पाली जिले में बहुत डिमांड है। ज्यों-ज्यों होली नजदीक आती है प्रवासी चंग खरीदने आते है। साल में मात्र एक बार होली के अवसर पर ही लोग चंग खरीदने आते है। डबगर ने बताया कि चंग बनाने का कार्य सीजन से दो माह पूर्व प्रारंभ कर दिया जाता है। होली से आठ दस दिन पूर्व चंग की मांग जोरदार होती है। ख़ास बात ये है कि अब तो प्रवासी खुद आने की बजाय ओन लाइन मनी ट्रांसफर के जरिये ही चंग की मांग करने लगे है.
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