मैदान में नहीं, पर आज कई नेताओं का सियासी कद दांव पर

मौजूदा लोकसभा चुनाव बन गए हैं राजनीतिक चुनौती

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जयपुर। राजस्थान के मौजूदा लोकसभा के चुनाव दिग्गज राजनेताओं के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुके हैं। कुछ राजनेताओं के लिये तो यह चुनाव सियासी तौर पर शह और मात के समान भी कहे जा सकते हैं। कई दिग्गज खुद तो चुनाव नहीं लड़ रहे, लेकिन उनका सियासी कैरियर इन चुनावों में दांव पर है। चुनावों के परिणाम नई लोकसभा की तस्वीर तो लिखेंगे ही साथ ही उन दिग्गज राजनेताओं के सियासी भाग्य का फैसला भी करेंगे, जिनके लिये यह चुनाव सियासी नैया पार लगाने और किनारे लगाने वाले दोनों में से कुछ भी हो सकते हैं। दिग्गज राजनेताओं में कुछ ऐसे हैं, जिन्होंने मूल पार्टी को त्याग कर अलग लाईन खींच दी। कुछ ऐसे जिन्होंने पार्टी लाइन पर चलते हुये ही अपनी पार्टी के उम्मीदवार को आंखे दिखा दी। कुछ ऐसे हैं, जिनका करियर इन चुनावों के जरिये साख पर है। यह तमाम दिग्गज नेता वो हैं, जिन्होंने खुद चुनावी समर में उतरना ठीक नहीं समझा, लेकिन पूरे चुनाव के दौरान यह सियासत की मुख्यधारा में रहे, भले ही तेवर विद्रोही ही रहे हो या बगावती।
कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला (भाजपा-गुर्जर नेता)


लोकसभा चुनावों से पहले कर्नल बैंसला ने भाजपा का दामन थाम लिया। गुर्जर नेता और आंदोलनकारी के नाते उनकी देश और प्रदेश में छवि रही है। हालांकि पहले भी भाजपा में आकर टोंक-सवाई माधोपुर से चुनाव लड़ा था। उस समय चुनाव हारने से उनकी राजनीतिक पारी शुरू से होने पहले ही खत्म हो गई थी। अब नये सिरे से कर्नल बैंसला ने बीजेपी में फिर वापसी की हैष्। चुनाव लड़ने के बजाये कर्नल बैंसला और उनके पुत्र विजय बैंसला ने भाजपा के लिये काम किया। गुर्जर समाज को भाजपा से जोड़ पाए तो ये बैंसला के लिये जीत होगी। विधानसभा चुनावों में गुर्जर समाज पूरी तरह भाजपा से छिटक गया था। आंदोलन और राजनीति का साथ संपूर्ण चुनावी सफलता पर निर्भर करता है । बैंसला के कारण भाजपा को सर्वाधिक उम्मीद पूर्वी राजस्थान से है।
डॉ.किरोड़ी लाल मीणा (राज्यसभा सांसद भाजपा)


आखिरी वक्त तक डा.किरोड़ी के कारण ही बीजेपी में दौसा का टिकट अटका था। डॉ.किरोड़ी के लिये दौसा लोकसभा सीट काफी अहम थी। उनके परिजनों का टिकट नहीं होना यहां उनके लिये मलाल समान था। जसकौर मीना के टिकट को डॉ. किरोड़ी कैम्प पचा नहीं पाया था। भाजपा आलाकमान ने डॉ. किरोड़ी से चुनावों में मन से लगने को कहा था। दौसा में डॉ किरोड़ी फेक्टर भी हार और जीत का एक बड़ा कारण बनेगा। सपोटरा और महुवा गंवाने के बाद डॉ.किरोड़ी के लिये भी यह प्रतिष्ठा का चुनाव है।
घनश्याम तिवाड़ी (वरिष्ठ कांग्रेस नेता)


लोकसभा चुनावों से पहले तिवाड़ी कांग्रेस में शामिल हो गये। अपनी मूल पार्टी बीजेपी को इन्होंने अलविदा कह दिया। आज तिवाड़ी कांग्रेस में अशोक गहलोत के विश्वस्त सिपहसलार हैं। गहलोत ने हर चुनावी सभा में तिवाड़ी का जिक्र किया। तिवाड़ी के अघोषित आपातकाल से जुड़े संबोधन को बार-बार दोहराया गया। तिवाड़ी के लिये चुनौती यह है कि वो अपने समाज को कांग्रेस से कितना जोड़ पाए। कांग्रेस ने उन्हें बतौर स्टार प्रचारक कई चुनावी क्षेत्रों में भेजा था। तिवाड़ी की बगावत सफल रही तो वे कांग्रेस में बड़े क्षत्रप के तौर पर उभरेंगे। गहलोत सरकार में उन्हें सम्मानजनक और प्रमुख स्थान मिल सकता है। भारत वाहिनी के बैनर तले चुनाव हारने के बाद उन्हें है संजीवनी की तलाश थी।
देवी सिंह भाटी (वरिष्ठ नेता)


बीजेपी में रहते हुये अर्जुन राम मेघवाल को बीकानेर से टिकट देने का भाटी ने विरोध किया था। टिकट नहीं कटवा पाये तो खुलकर विरोध जता दिया। बीजेपी ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। भाटी के लिये अर्जुन राम मेघवाल की पराजय ही बड़ी जीत है। उन्होंने मेघवाल के कारण बीजेपी से अलग होना ज्यादा उचित समझा। भाटी के गैर मेघवाल जातीय सम्मेलन की रणनीति कितनी सफल रही यह परिणामों से तय होगा। राजपूत वोटों और कोलायत का अंतर भी परिणाम से सामने आ जायेगा। रणनीति में सफल रहे तो देवीसिंह भाटी की सियासत फिर से चमकेगी। अर्जुन राम मेघवाल के चुनाव जीतने पर नई राजनीति के बारे में निर्णय करना पड़ेगा। देवी सिंह भाटी की बहू विधानसभा चुनावों में कोलायत से भाजपा उम्मीदवार थी लेकिन मोदी लहर के बावजूद कोलायत में पराजय मिली। कोलायत के चुनावों ने ही भाटी और मेघवाल के बीच खाई पैदा करने का काम किया ।
रामेश्वर डूडी (पूर्व नेता प्रतिपक्ष)


बीकानेर में मदन गोपाल मेघवाल के टिकट को उनसे जोड़ कर देखा जा रहा। डूडी के कारण जाट वोटों के शिफ्टिंग की उम्मीद की जा रही है। बीकानेर का परिणाम डूडी के सियासी भाग्य से भी जुड़ा है। सियासी कद के इजाफे मे यह तथ्य भी मायने रहेगा।
कर्नल सोनाराम (वरिष्ठ नेता भाजपा)


कर्नल सोनाराम की पूरे चुनावों में ही तल्खी रही। भाजपा तो नहीं छोड़ी लेकिन मन से साथ भी नहीं आ पाये। कैलाश चौधरी का बाड़मेर से टिकट उनके गले नहीं उतरा। मौजूदा सांसद के नाते व बाड़मेर से फिर चुनावलड़ना चाहते थे। उनके कांग्रेस में भी जाने की बात पूरे चुनाव के दौरान चर्चा में रही। चुनाव परिणाम तय करेंगे कि सीमावर्ती क्षेत्र में क्या रहेगा कर्नल का भाग्य ।
प्रहलाद गुंजल (वरिष्ठ नेता भाजपा)


गुंजल हिमायती नहीं थे कि कोटा से ओम बिरला को टिकट मिले। इसे लेकर उन्होंने बीजेपी में जमकर अपना विरोध भी जताया। बिरला को टिकट मिला तो गुंजल उनके प्रचार से पूरी तरह दूर ही रहे। नेतृत्व की समझाइश पर भी प्रहलाद गुंजल ने कदम पीछे नहीं हटाये। हाड़ौती में गुंजल को गुर्जर समाज का बड़ा नेता माना जाता है। ऐसे में रामनारायण मीना को गुंजल की नाराजगी से उम्मीद है। कोटा का यह चुनाव प्रहलाद गुंजल की विरोध की रणनीति का इम्तिहान है। भाजपा उम्मीदवार का साथ नहीं देकर पूरे चुनावों में उन्होंने तेवर तीखे ही रखे।
गुलाब चंद कटारिया (नेता प्रतिपक्ष)


गुलाब चंद कटारिया के लिये यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण है। मेवाड़ में उनके कारण ही दीया कुमारी को एंट्री मिली। उदयपुर , बांसवाड़ा-डूंगरपुर व राजसमंद ये तीनों सीटें उनके लिये अहम हैं। कटारिया कैम्प की रणनीति के अनुसार ही मेवाड़-वागड़ में चुनाव लड़ा गया। यहां के परिणाम कटारिया के राजनीतिक कद को भी प्रभावित करेंगे।
प्रमोद जैन भाया (खनिज मंत्री)


झालावाड़-बारां में कांग्रेस मतलब प्रमोद भाया को माना जाता है। कांग्रेस प्रत्याशी प्रमोद शर्मा के पीछे भी उनका ही दिमाग रहा। प्रमोद के पीछे झालावाड़-बारां में प्रमोद ही खड़े रहे। यहां के चुनाव परिणाम उनकी सियासत को प्रभावित करेंगे।
प्रताप सिंह खाचरियावास (परिवहन मंत्री)


जयपुर में पूर्व मेयर ज्योति खंडेलवाल के टिकट के पीछे खाचरियावास की भूमिका रही। गैर ब्राह्मण कार्ड चलाया जाना यहां नई रणनीति का भाग था। चुनाव परिणामों से जयपुर की सियासत प्रभावित होगी तो खाचरियावास की भी राजनीति पर असर पड़ेगा। नये सियासी समीकरण भविष्य में जयपुर में देखने को मिल सकते हैं।
विश्वेन्द्र सिंह (पर्यटन मंत्री गहलोत सरकार)


भरतपुर का पूरा चुनाव पूर्व महाराजा विश्वेन्द्र सिंह के कंधो पर ही रहा। विश्वेन्द्र सिंह की एनओसी के बाद ही अभिजीत कुमार जाटव को टिकट मिला। जाटव उम्मीदवार को जाट वोट की पूरी शिफ्टिंग का दारोमदार उन्हीं पर है। भरतपुर के हर वर्ग के बीच विश्वेन्द्र सिंह की पैठ मानी जाती है। कांग्रेस की जीत से उनका प्रदेश की सियासत में कद बढ़ना तय है ।
रमेश मीना (खाद्य नागरिक आपूर्ति मंत्री)


करौली-धौलपुर के टिकट के पीछे रमेश मीना की ही रणनीति रही। बैरवा की जगह जाटव कार्ड खेलने की रणनीति उन्हीं की मानी गई। सपोटरा से फिर चुनाव जीतने के बाद रमेश मीना क्षत्रप बन चुके हैं। रमेश मीना के कारण मीना वोटों के कांग्रेस में जाने की पूरी उम्मीद है। नये चेहरे संजय जाटव की जीत और हार को प्रभावित सकती है।
राजेन्द्र राठौड़ (उपनेता प्रतिपक्ष)


चूरु का चुनाव राठौड़ का साख से जुड़ा है। राठौड़ राहुल कस्वां के टिकट के पक्ष में नहीं थे । अंत समय में आलाकमान और कस्वां परिवार की पहल पर वे माने। राठौड़ के सियासी कद का गुणा-भाग चूरु के चुनाव पर टिका है। वे प्रदेश के कद्दावर राजपूत क्षत्रप माने जाते हैं। हालांकि परिणामों से पहले ही उनकी सक्रियता देखने लायक है।
यूनुस खान (भाजपा नेता)


नागौर में हनुमान बेनीवाल के नाम पर उनका समर्थन नहीं था। यूनुस खान ने बेनीवाल के प्रचार में भी रुचि नहीं ली जबकि यूनुस खान डीडवाना से विधायक और फिर मंत्री रह चुके हैं। खान का प्रभाव नागौर के मुस्लिम वोटों पर है। टायर के चिन्ह पर बेनीवाल की हार-जीत उनकी सियासत को प्रभावित करेगी।
राजकुमार रिणवां (पूर्व मंत्री- कांग्रेस नेता)


लोकसभा चुनावों से ठीक पहले कांग्रेस में पहुंच गये। बीजेपी ने रतनगढ़ से टिकट काटा था और वह नाराजगी उनके जहन में थी। अशोक गहलोत से बातचीत के बाद मन बदला और कांग्रेस के साथ हो लिये । कांग्रेस को उम्मीद है कि उनसे शेखावाटी में ब्राह्मण वर्ग सधेगा। रिणवां के सियासी कैरियर को भी मौजूदा चुनाव से आशाएं हैं।
संतोष अहलावत (पूर्व सांसद भाजपा)


झुंझुनूं से संतोष अहलावत का बीजेपी ने टिकट काटा उनकी जगह नरेन्द्र कुमार को उम्मीदवार बनाया। अहलावत समर्थकों को उनका टिकट कटना नागवार गुजरा है। इसके अलावा कांग्रेस प्रत्याशी श्रवण कुमार और अहलावत का गृह इलाका समान है। हालांकि संतोष अहलावत ने अनुशासन की सीमाएं नहीं लांघी । अब सबकी नजरें टिकी है चुनाव परिणाम और अहलावत परिवार पर।
बृजेन्द्र ओला (कांग्रेस विधायक)


झुंझुनूं में कांग्रेस के अंदर कलह दिखी। यहां ओला परिवार का टिकट काटकर श्रवण कुमार को थमाया गया। शेखावाटी और झुंझुनूं के सियासी इतिहास में ओला परिवार के साथ ऐसा पहली बार हुआ जबकि यहां की सियासत में कांग्रेस और शीशराम ओला को पर्याय माना जाता रहा है। वहीं श्रवण कुमार के साथ ओला परिवार के कभी सुखद रिश्ते भी नहीं रहे। चुनाव परिणाम यहां सियासत की नई भाषा लिखेंगे।

Web Title : Rajasthan leader on target due to election result 2019