राजस्थान चुनाव: मेवाड़-वागड़ जीतने वाले का होता है प्रदेश, इस बार दो दिग्गजों में है मुकाबला

राजस्थान का मेवाड़-वागड़ रीजन. कहा जाता है कि यहां चुनाव में बढ़त लेने वाला पूरे राज्य में बढ़त ले लेता है. ट्राइबल बेल्ट होने के साथ-साथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र इस रीजन को शुरू से कांग्रेस का मजबूत किला माना जाता रहा है. लेकिन साल 2003 के चुनाव ने पूरा समीकरण बदल दिया और बीजेपी ने यहीं से एकतरफा लीड ले लिया था. इस बार यहां लड़ाई कांटे की है और ऊंट किस करवट बैठेगा इसका अनुमान भी लगाना मुश्किल होता जा रहा है.

ये रहा है रिजल्ट
साल 2003 के चुनाव में बीजेपी को रीजन की 28 सीटों में से 22 सीटों पर जीत मिली. इतना ही नहीं बीजेपी सरकार तक बनाने में सफल रही. साल 2008 के चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर यहां से बढ़ती ली और 20 सीट जीतने में कामयाब हुई. साल 2013 के चुनाव में एक बार फिर बीजेपी ने करिश्मा दोहराया और 25 सीट जीतने में सफल हो गई.

बीजेपी की परेशानी
प्रदेश में इस बार एंटी-इन्कंबेंसी का माहौल है और ऐसे में बीजेपी के माथे पर पसीना आना लाजमी है. बीजेपी ने उदयपुर में प्राइवेट एजुकेशनल इंस्टीट्यूट और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट लाने की कोशिश की है, लेकिन उसे बड़ी राहत मिलती दिख नहीं रही है. नागरिकों के मुद्दे और बेतरतीब कामों के साथ जिले के मुख्यालय पर दो तालाबों की सफाई की भी बात हो रही है.

ये है बड़ी मांग
उदयपुर के लोगों के पिछले कई साल से सबसे बड़ी मांग है कि उसे अहमदाबाद से रेल कनेक्टिविटी मिल जाए. इस चुनाव में यह सबसे बड़ा मुद्दा है. यहां बीजेपी के गुलाब चंद कटारिया और कांग्रेस की गिरिजा व्यास के बीच कड़ा मुकाबला है. दोनों ही पुराने नेता हैं. मजेदार बात है कि कटेरिया को अबतक दो ही बार हार का सामना करना पड़ा है और दोनों बार गिरिजा व्यास ने उन्हें हराया है.

एसटी सीटें
यहां को लोगं की कहना है कि रोजगार न मिलना यहां के युवकों के विस्थापन का एक बड़ा कारण है. यहां के ज्यादातर युवक गुजरात और मुंबई सहित दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए चले गए हैं. पूरा क्षेत्र आदिवासी बाहुल्य है. 8 में से 5 सीट आदिवासी बाहुल्य हैं और एसटी कैंडिडेट के लिए रिजर्व हैं.

Web Title : Rajasthan elections: Mevad-Waghee wins state