चौतरफा चोट से छलनी पचपदरा साल्ट का लवण उद्योग, रिफाइनरी की भेंट चढी 189 नमक खानों को सरकारी मरहम की दरकार

-न जमीन मिली ना मुआवजा, ठण्डे बस्ते में सरकारी वादा

जोधपुर/पचपदरा। पचपदरा साल्ट के रिफाइनरी प्रभावित लवण उत्पादकों को सरकारी मदद और मरहम की दरकार है। रिफाइनरी जैसे बडे प्रोजेक्ट के लिए इस इलाके की करीब 189 लवण खानें बबार्दी की भेंट चढा दी गई। सदियों पुराने परम्परागत लवण उद्योग से जुडे सैंकडों परिवारों की रोजी-रोटी पर सीधी चोट के बावजूद मुआवजे या पुनर्वास के तौर पर सरकारी दावे जमीनी हकीकत पर साकार नहीं हो पाए है। बबार्दी के दंश को झेल रहे नुकसान प्रभावित लवण उत्पादकों को मलाल इस बात का हैं कि सरकार ने उनके हितों पर चोट कर पुरखों की विरासत को तबाह कर दिया, लेकिन जो वादा लवण उत्पादकों के साथ किया गया था, उसे आज तक पूरा नहीं किया गया है।

दरअसल राजस्थान में अब तक के सबसे बडे प्रोजेक्ट के तौर पर गिनी जा रही रिफाइनरी की जद में पचपदरा साल्ट की करीब 189 खानें सीधे तौर पर नुकसान की जद में है। सरकार ने प्रशासन के माध्यम से खान मालिकों को निशाना बनाया और जमीन अपने हाथ में ले ली। नुकसान प्रभावित लवण उत्पादकों ने नुकसान की भरपाई के लिए सरकार से गुहार भी लगाई, लेकिन बात नहीं बनी। आखिरकार न्यायालय की शरण ली गई। प्रधानमंत्री की पचपदरा में सभा और इधर नुकसान प्रभावितों के आक्रोश और विरोध को देखते हुए प्रशासन ने लवण उत्पादक समाज से वार्ता कर यह भरोसा दिलाया कि जिनकी नमक खानें रिफाइनरी की जद में आई हैं, उनका सर्वे करवाकर जमीन के बदले जमीन दी जाएगी, ताकि प्रभावित खान मालिकों का पुनर्वास किया जा सके। प्रशासन के इस भरोसे के बाद आक्रोश भी शात हो गया और पचपदरा में प्रधानमंत्री की सभा भी शांतिपूर्वक सफल हो गई। लेकिन इसके बाद सेलाइन एरिया में खान मालिकों को जमीन के बदले जमीन मुहैया करवाने का प्रशासन का वादा ठण्डे बस्ते में चला गया।

नुकसान का आंकडा करोड़ों में
रिफाइनरी के कारण पचपदरा साल्ट के परम्परागत लवण उद्योग को जो नुकसान हुआ हैं, उसका आंकडा करोड़ों में है। चालू खानें, जिनमें नमक का उत्पादन हो रहा था, उन्हें खान मालिकों की नजरों के सामने जमींदोज कर दिया गया। खानों में पड़ी नमक की फसल रेत से पाटने के बाद खानों में ही दफन हो गई। एतराज और विरोध प्रशासन की सख्ती के सामने धरे ही रह गए। लेकिन इतने बडे नुकसान के बावजूद मुआवजे के तौर पर धेला तक नहीं दिया गया। पुनर्वास के लिए जमीन के बदले जमीन देने की बात पर भी अमल नहीं हो पाया है। इसके अलावा यदि जमीन का टुकडा मिल भी गया तो बिना सरकारी मदद के खान की खुदाई पर लाखों रुपये का खर्च वहन कर पाना नमक उत्पादकों के बूते की बात नहीं है।

ताबूत में अंतिम कील
लवण उद्योग पर बबार्दी की चौतरफा चोट हुई है। नमक की 189 खानों को तो सीधे तौर पर नुकसान हुआ हीं, ऐसी दर्जनों खानें वे भी थी, जिन्हें रिफाइनरी एरिया में काम कर रहे ठेकेदारों ने बर्बाद कर डाला। कई खानों की मिट्टी की दीवारें ढहा दी गई। खानों पर बूस्टिंग पम्प लगाकर नमकीन पानी की चोरी की बढती घटनाओं ने लवण उत्पादकों की नींद उड़ा दी। पचपदरा पुलिस थाने में मामले दर्ज होने के बाद भी सिलसिला नहीं थम पाया है। बडे पैमाने पर नुकसान और सरकार की बेरुखी के कारण नमक उत्पादक आज भी सदमे से उबर नहीं पाए है।

हक के लिए लडाई जारी हैं
पचपदरा साल्ट में लवण उधोग के हितों के साथ हुए सरकारी अन्याय के खिलाफ राजस्थान उच्च न्यायालय में वाद विचाराधीन है। हमें न्यायालय के फैसले पर पूरा भरोसा हैं, वहां हमें न्याय अवश्य मिलेगा। रिफाइनरी को लेकर हमारा कोई विरोध नहीं है। लवण उत्पादक समाज भी चाहता है कि रिफाइनरी यहां लगे, लेकिन सरकार हमारे हितों की रक्षा भी सुनिश्चित करें।
पारसमल खारवाल, अध्यक्ष, श्री सांभरा आशापुरा नमक उत्पादक समिति

Web Title : Salt salts industry from patchwork